ताज ख़ान
नर्मदापुरम//
इस्लाम और बहुसांस्कृतिक समाज,भारत एक उदाहरण
इस्लाम एक ऐसा समग्र और पूर्ण जीवन-व्यवस्था है जो न केवल व्यक्ति के नैतिक और आध्यात्मिक विकास का मार्गदर्शन करता है,बल्कि एक आदर्श समाज के निर्माण के सिद्धांत भी प्रदान करता है।इस्लामी शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह बहुसांस्कृतिक (Multicultural) समाज को न केवल स्वीकार करता है बल्कि उसे बढ़ावा भी देता है।एक ऐसा समाज जहाँ विभिन्न धर्मों,संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं के लोग आपसी सम्मान, सहिष्णुता और न्याय के साथ जीवन बिताएँ,इस्लाम के अनुसार एक आदर्श समाज है।
कुरआन की तफ़सीर।
क़ुरआन में अल्लाह -त-आला फ़रमाता है:”ऐ लोगों!हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको”(सूरह अल-हुजुरात:13)।यह आयत इस बात को स्पष्ट करती है कि मानव समाज में विविधता एक स्वाभाविक और सकारात्मक वास्तविकता है,जिसका उद्देश्य आपसी पहचान और संबंधों को मजबूत करना है, न कि भेदभाव और श्रेष्ठता स्थापित करना।इसी तरह क़ुरआन में धार्मिक स्वतंत्रता का सिद्धांत इस प्रकार बताया गया है:”तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म और मेरे लिए मेरा धर्म”(सूरह अल-काफ़िरून: 6)।
पैग़ंबर मुहम्मद का जीवन एक बहुसांस्कृतिक समाज की जीवंत मिसाल प्रस्तुत करता है।मदीना में “मीसाक-ए-मदीना” के माध्यम से विभिन्न धर्मों के लोगों को एक साझा सामाजिक व्यवस्था में जोड़ा गया,जहाँ सभी को समान अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।
सभी के अधिकार।_
हदीसों में भी गैर-मुस्लिमों के अधिकारों पर विशेष जोर दिया गया है।जैसे कि आपने फ़रमाया:”जिसने किसी ज़िम्मी(गैर-मुस्लिम नागरिक)को तकलीफ़ दी, उसने मुझे तकलीफ़ दी”। इसके अलावा यह कथन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि “तुममें सबसे बेहतर वह है जो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभदायक हो”,जो मानवता की सेवा और आपसी सहयोग का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है।
भारतीय समाज का विश्लेषण।
यदि हम भारतीय समाज का विश्लेषण करें तो यह एक बहुसांस्कृतिक व्यवस्था की उत्कृष्ट मिसाल के रूप में सामने आता है।यहाँ हिंदू, मुस्लिम,सिख,ईसाई,बौद्ध और अन्य धर्मों के अनुयायी सदियों से साथ रहते आए हैं।भाषाओं,रीति-रिवाजों, पहनावे और भोजन की विविधता इस देश की पहचान है,और यही विविधता इसकी शक्ति है, कमजोरी नहीं।इसी प्रकार यहाँ विभिन्न धर्मों के त्योहार भी मिल-जुलकर मनाए जाते हैं।दिवाली,ईद, क्रिसमस,और गुरु नानक, जयंती जैसे अवसरों पर लोग एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होते हैं,जो आपसी सद्भाव और सहिष्णुता की बेहतरीन मिसाल है।यही वे मूल्य हैं जिन्हें इस्लाम भी प्रोत्साहित करता है।हालाँकि यह भी सच है कि बहुसांस्कृतिक समाजों को कभी-कभी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है,जैसे सांप्रदायिक तनाव,पक्षपात और असहिष्णुता।इस्लाम इन समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है।वह सिखाता है कि मतभेदों के बावजूद शांति बनाए रखी जाए,एक-दूसरे के विश्वासों का सम्मान किया जाए और किसी के साथ अन्याय न किया जाए। क़ुरआन में कहा गया है: “बुराई को भलाई से दूर करो”(सूरह फ़ुस्सिलत: 34), जो सामाजिक समरसता स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।आज के दौर में जब पूरी दुनिया में पहचान और संस्कृति के मुद्दे गंभीर होते जा रहे हैं,इस्लामी बहुसांस्कृतिक समाज की अवधारणा एक संतुलित और व्यापक समाधान प्रस्तुत करती है।यह न केवल विभिन्न सभ्यताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करती है बल्कि एक ऐसे समाज के निर्माण में सहायक है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त हों और वह सम्मान के साथ जीवन जी सके।
अंततः
यह कहा जा सकता है कि इस्लाम का बहुसांस्कृतिक समाज का सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट,व्यावहारिक और मानवतावादी है,और भारत इसकी एक बेहतरीन जीवंत मिसाल के रूप में सामने आता है।यदि इन सिद्धांतों को सही अर्थों में अपनाया जाए तो न केवल एक देश बल्कि पूरी दुनिया में शांति, सहिष्णुता और भाईचारे का वातावरण स्थापित किया जा सकता है।
(लेखक शहाबुद्दीन,दिल्ली के एक स्वतंत्र इस्लामिक विचारक और चिंतक हैं।)

