ताज ख़ान
इटारसी//
इस समय जुलाई का महीना चल रहा है जिसमें भारी बारिश हुआ करते थे लेकिन इस वर्ष जुलाई मा पूरा सुखा गुजर रहा है जो अपने आप में एक बहुत बड़ी चिंता भी खड़ी कर रहा है कि अगर पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो फसलों का क्या होगा साथ ही सूखे जैसे आसार बनने के कगार पर नजर आ रहे हैं इसी मुसीबत को देखते हुए इटारसी जामा मस्जिद 5 लाइन इटारसी इंतजामिया कमेटी ने यह निर्णय लिया कि वह बारिश के लिए विशेष नमाजे इस देश का का आयोजन करेंगे जो इटारसी नगर में अलग-अलग स्थान पर तीन दिन लगातार अदा की जाएगी। कमेटी प्रवक्ता जमील अहमद ने बताया कि आज दिन मंगलवार से तीन दिन जामा मस्जिद कमेटी बारिश के लिए विशेष नमाज़ नमाज़-ए-इस्तिस्क़ा का आयोजन करने जा रही है। उन्होंने कहा कि
वर्तमान में बारिश नहीं होने के कारण सूखे जैसे हालत निर्मित हो रहे है.सभी लोग इस समय वर्षा नहीं होने से गर्मी से परेशान है।किसान अपनी फसलों को लेकर चिंतित है। इस मुसीबत से निजात के लिए मुस्लिम समाज बारिश की विशेष नमाज नमाज़-ए-इस्तिस्क़ा जो की बारिश के लिए विशेष नमाज जो शहर के बाहर खुले मैदान में पढ़ी जाती है.कराने जा रहे है। तीनों दिन अलग-अलग स्थानों पर अदा की जाएगी।नमाज व दुआ का कार्यक्रम लगभग एक घंटा चलेगा इसमें नमाज पढ़ी जायेगी और अल्लाह से बारिश के लिए विशेष दुआएं की जायेगी।
कहां और कब होगी नमाज़।
1:पहली नमाज़ तारीख 14/07/2026,दिन मंगलवार,भारद्वाज पेट्रोल पंप के पीछे नहर के पास वाले मैदान पर.दोपहर 2:30 बजे।
2:दूसरी नमाज़ 15/07/2026,दिन बुधवार, बोरतलाई मार्ग बृद्धी माता मंदिर के पीछे निजामुद्दीन मोहसिन कुरैशी की कॉलोनी वाला मैदान,दोपहर 2:30 बजे।
3:तीसरी नमाज़
16/07/2026,दिन गुरुवार, मदरसा इब्राहिमिया 12 बंगला के मैदान में दोपहर 2:30 बजे अदा की जायेगी।
क्या है ये विशेष नमाज़ का उद्देश्य और इसकी अहमियत।
मुस्लिम समाज में नमाज़-ए-इस्तिस्क़ा
(Salat al-Istisqa)वह विशेष नमाज़ है जो बारिश (वर्षा) की दुआ के लिए पढ़ी जाती है।जब किसी क्षेत्र में सूखा (अकाल) पड़ जाता है,पानी की भारी कमी हो जाती है या लंबे समय तक बारिश नहीं होती,तब अल्लाह से पानी बरसाने की गुहार लगाने के लिए यह नमाज़ सामूहिक रूप से अदा की जाती है। ‘इस्तिस्क़ा’का अरबी में शाब्दिक अर्थ ही होता है”(पानी मांगना)”।
इस नमाज़ से जुड़ी कुछ मुख्य बातें नीचे दी गई हैं।
यह एक सुन्नत नमाज़ है (पैगंबर मुहम्मद मुस्तफा सल्ललल्लाहों अलैह वसल्लम)से इसकी परंपरा मिलती है।
तरीका।
इसमें अमूमन 2 रकात नफ़्ल नमाज़ जमात(सामूहिक रूप से)के साथ पढ़ी जाती है। इस नमाज़ के लिए अज़ान या इक़ामत नहीं कही जाती।इसे आमतौर पर मस्जिद के बजाय शहर या आबादी से बाहर किसी खुले मैदान (ईदगाह या जंगल)में जाकर पढ़ना मसनून (सुन्नत) माना जाता है।
खुत्बा और विशेष दुआ।
नमाज़ के बाद इमाम साहब ईद की नमाज़ की तरह खुत्बा (भाषण/उपदेश) देते हैं।इसके बाद सभी लोग बेहद आजिज़ (विनम्रता) और रो-रोकर अल्लाह से गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं और बारिश के लिए दुआ करते हैं।दुआ के दौरान अपनी चादरों या दुपट्ठों को उलटने-पलटने की भी रिवायत है,जो इस बात का प्रतीक है कि’ए-अल्लाह, हमारे हालात भी इस सूखे से खुशहाली में बदल दे।’इस नमाज़ को पढ़ने से पहले लोगों को तौबा (गुनाहों की माफ़ी)करने, सदका (दान) देने और आपस के मनमुटाव दूर करने की सलाह दी जाती है ताकि दुआ जल्दी कुबूल होजाए।

