भोपाल मंडल: इटारसी डिपो के ‘गुड्स ट्रेन मैनेजर’ की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल,क्या विजिलेंस तक पहुंचेगा ‘घंटों’ का खेल।

ताज ख़ान
इटारसी//
पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल अंतर्गत इटारसी CYM यार्ड डिपो में पदस्थ एक ट्रेन मैनेजर (गार्ड) की कार्यप्रणाली इन दिनों साथी कर्मचारियों के बीच तीव्र आक्रोश और चर्चा का विषय बनी हुई है।गंभीर आरोप हैं कि डिपो में स्टाफ की भारी किल्लत होने के बावजूद,एक खास ट्रेन मैनेजर पर प्रशासनिक मेहरबानी की’विशेष वर्षा’ हो रही है।नियमों को ताक पर रखकर दी जा रही इस कथित छूट ने रेलवे परिचालन की निष्पक्षता और संरक्षा (Safety)दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं,अभी अभी एक सोशल मीडिया पर ये ट्रेन मैनेजर एक अधिकारी पर टिप्पणी कर कानूनी दांव पेच में भी फंसते दिख रहे हैं,जिनपर मान हानी की तलवार भी लटक रही है, बात हो रही है गुड्स गार्ड मनीष भगत की जिनकी कार्य प्रणाली ने अभी खासी चर्चा बटोर रखी है।

क्या है पूरा मामला?(विशेष मेहरबानी के गंभीर आरोप)

नियमों से परे ‘साप्ताहिक विश्राम’:** जहां सामान्य परिस्थितियों में रनिंग स्टाफ के लिए साप्ताहिक विश्राम (Weekly Rest) की अवधि लगभग 30 घंटे निर्धारित है, वहीं संबंधित ट्रेन मैनेजर को प्रायः 40 घंटे तक का लंबा विश्राम दिया जा रहा है।

मुख्यालय पर विश्राम का अनोखा खेल:

इटारसी डिपो में वर्तमान में लगभग 40 प्रतिशत स्टाफ की कमी है,जिसके कारण कई बार बड़ी दिक्कतों में मालगाड़ियां चलानी पड़ रही हैं।अन्य कर्मचारियों को समय पर छुट्टी या सामान्य विश्राम तक नसीब नहीं हो रहा।इसके विपरीत,इस खास कर्मचारी को प्रत्येक ट्रिप के बाद मुख्यालय पर 22 से 24 घंटे का विश्राम आसानी से मिल रहा है।

लॉबी से सांठगांठ और ‘मनमर्जी’ की बुकिंग:

विभागीय सूत्रों का दावा है कि संबंधित कर्मचारी भोपाल से अपनी सुविधानुसार अप-डाउन करता है।जब वह भोपाल से इटारसी आता है,तभी लॉबी में तैनात संबंधित बुकिंग क्लर्क से संपर्क कर गाड़ियां ‘सेट’करवाई जाती हैं। आरोप है कि इस पूरे खेल में CYM यार्ड और परिचालन विभाग के कुछ स्थानीय अधिकारियों का भी मौन संरक्षण प्राप्त है।

मुख्यालय (HQ) छोड़ने का नियम और सुरक्षा से समझौता?

रेलवे की सेफ्टी कैटेगरी (Safety Category) में कार्यरत कर्मचारियों के लिए संरक्षा के कड़े नियम हैं।
1.मुख्यालय पर उपस्थिति अनिवार्य:रनिंग स्टाफ को ड्यूटी के लिए हमेशा मुख्यालय पर उपलब्ध रहना अनिवार्य होता है।बिना सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति के कोई भी कर्मचारी हेडक्वार्टर नहीं छोड़ सकता।
2.लोकेशन की लुकाछिपी:सूत्रों के अनुसार, CYM यार्ड ऑफिस में कर्मचारियों द्वारा दिए जाने वाले ‘पारिवारिक घोषणा पत्र’और स्थानीय पते के रजिस्टर (HRMS डेटा) को संबंधित कर्मचारी द्वारा पिछले एक साल से अपडेट ही नहीं किया गया है। इसके बावजूद डिपो प्रभारी की चुप्पी उन्हें भी संदेह के दायरे में लाती है।
भोपाल ट्रांसफर की बिसात और ‘लेनदेन’ की चर्चाएं भी हैं।रेलवे गलियारों में उड़ती खबरों और सूत्रों की मानें तो यह पूरी विशेष व्यवस्था केवल इसलिए बनाई गई है ताकि कर्मचारी जल्द से जल्द इटारसी से अपना ट्रांसफर भोपाल मंडल के ही किसी अन्य सुविधाजनक अनुभाग में करा सके। इसके लिए कथित रूप से ऊंचे स्तर पर ‘सांठगांठ’ और लेनदेन की चर्चाएं भी गर्म हैं।

बड़ा सवाल: क्या हरकत में आएगा विजिलेंस विभाग? जहां एक तरफ रेलवे जीरो टॉलरेंस और पारदर्शिता का दावा करता है,वहीं धरातल पर “घंटों और पसंदीदा बुकिंग”का यह खेल कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।अब देखना यह होगा कि क्या भोपाल मंडल के उच्च अधिकारी और विजिलेंस (सतर्कता) विभाग इस डिपो के रिकॉर्ड्स को खंगालकर जांच शुरू करता है, या फिर नियमों को ठेंगा दिखाकर यह ‘स्पेशल ड्यूटी’यूं ही चलती रहेगी?सूत्रों का दावा है कि इस मामले में जल्द ही बड़े खुलासे हो सकते हैं।

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