ताज ख़ान
नर्मदापुरम//
मां नर्मदा की पावन और कल-कल बेहती धारा का यह शहर नर्मदापुरम।एक ऐसा शहर जहाँ हर कंकड़ में शंकर का वास प्रतीत होता है,जहाँ की आबोहवा में भक्ति,शक्ति और संस्कृति की महक रची-बसी है।जहाँ नर्मदा का जल निरंतर बेहते हुए जीवन में कभी न थमने और आगे बढ़ते रहने का संदेश देता है,वही शहर जब आस्था के रंग में रंगता है,तो पूरा नज़ारा अद्भुत हो जाता है।लेकिन,लाखों की इस आस्था को सुरक्षित रखना,भक्ति के इस महासमंदर को अनुशासित करना,यह केवल व्यवस्था संभालना नहीं,बल्कि अपने भीतर के संकल्प की परीक्षा देना है।
और इस परीक्षा को पूरे समर्पण के साथ उत्तीर्ण किया है,हमारे नर्मदापुरम के पुलिस प्रशासन और मुस्तैद ख़ाकी के जवानों ने।
जब माँ की विदाई का समय आया,तो रक्षकों ने संभाला मोर्चा।
विगत 9 दिनों से देश सहित पूरा नर्मदापुरम शहर आदिशक्ति माँ दुर्गा की आराधना में लीन था।चारों ओर गरबा रास, जगराते और मंत्रोच्चार की गूँज थी।जहाँ नागरिक आस्था में डूबे थे,वहीं शहर के सुरक्षादूत-ख़ाकी वर्दी वाले एक अलग ही साधना में लीन थे।उनका संकल्प था“हर माँ,बहन,बेटी और नागरिको की सुरक्षा।
विसर्जन का दिन।
बुधवार से जब माँ की प्रतिमाओं का विसर्जन शुरू हुआ,तब से लेकर शुक्रवार की भोर तक,24 घंटे लगातार ड्यूटी।ना खाने का वक्त,ना सोने की फुर्सत।पैरों में थकान थी,पर आँखों में जिम्मेदारी की सजगता।पेट में भूख थी,पर सीने में अपने कर्तव्य का स्वाभिमान।
सड़कों पर उतरा आस्था का सैलाब।
गुरुवार-शुक्रवार की दरमियानी रात जब शहर की ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित प्रतिमाओं का चल समारोह सड़कों पर निकला,तो मानो पूरा नर्मदापुरम माँ आदिशक्ति को अश्रुपूरित विदाई देने उमड़ पड़ा।जुलूस में हजारों महिलाएँ,बेटियाँ और बच्चे शामिल थे।लेकिन इस भीड़ के बीच,हर कदम पर छाँव बनकर खड़े थे,पुलिस के जवान।
कप्तान से लेकर जवान तक,एक अभेद्य सुरक्षा घेरा।
जहाँ ज़िला कप्तान (एसपी) खुद पल-पल की मॉनिटरिंग कर रहे थे,वहीं डीएसपी ट्रैफिक सड़कों पर उतरकर खुद गाड़ियों का पहिया संभाल रहे थे। एसडीओपी की सक्रियता और थाना प्रभारियों का मैदान में डटे रहना यह बता रहा था कि यह केवल ड्यूटी नहीं,बल्कि एक परिवार की तरह पूरे शहर की रक्षा का प्रण है।बड़े-बड़े गरबा इवेंट्स से लेकर विसर्जन की तंग गलियों तक ख़ाकी ने हर मोर्चे को ऐसे थामा,मानो शहर का हर नागरिक उनका अपना परिवार हो। उन्होंने आस्था का सम्मान भी किया और सुरक्षा का दायरा भी टूटने नहीं दिया।
आइए आज समझें,कौन है यह ख़ाकी?
यह वही खाकी है,जिसे कभी-कभी बातों-बातों में कटघरे में खड़ा कर देते हैं, कभी क़लमकारों की पैनी नज़र झेलते हैं, तो कभी माननीयों की सख़्त बोली झेलते हैं।कभी क्रूर कहे जाते हैं,कभी नाराज़गी भी सहते हैं,कभी इनके सख़्त लहज़े पर उँगली उठा देते हैं।लेकिन सोचिए..जब शहर पर कोई विपदा आती है,तो सबसे पहला ख्याल किसका आता है?खाकी का।
जब भयानक दुर्घटना होती है,तो सबसे पहले लपककर हाथ कौन बढ़ाता है?खाकी का जवान।
करवा चौथ की रात जब जीवन संगनी इंतज़ार करती हैं तब ये सुरक्षा के इंतज़ामों में लगे रहते हैं।
हर पति अपने घर पर दीया जला रहा होता है,तब यह ख़ाकी वाले चौराहों पर खड़े होकर हमारे परिवार,बहनों,बेटियों की सुरक्षा का दायरा बना रहे होते हैं।
खाकी सिर्फ एक वर्दी नहीं,यह त्याग की एक ख़ामोश खड़ी इबारत है।
यह वह इंसान है जो भूखा रहकर भी हमें सुरक्षित महसूस कराते हैं।जो रातों को जागता है ताकि लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ चैन की नींद सो सकें, तेज़ धूप में रास्ता दिलवाते हैं, कड़ाके की ठंड में हिफ़ाज़त देते हैं।
हमारा भरोसा,हमारा फ़क्र, ख़ाकी।
नर्मदापुरम में सभी आयोजनों का निर्विघ्न, शांतिपूर्ण और गरिमामयी ढंग से संपन्न होना,इस बात का सबसे बड़ा सबूत है,कि खाकी केवल व्यवस्था का नाम नहीं, खाकी हमारे विश्वास का प्रतीक है।इस वर्ष फिर नर्मदापुरम पुलिस के जवानों और अधिकारियों ने साबित कर दिया कि वे सिर्फ कानून के रखवाले नहीं,बल्कि इस शहर के रक्षक-दूत हैं।नर्मदापुरम की पावन धरा से हर उस जवान को दिल से सलाम,जिसने अपने परिवार को पीछे छोड़,पूरे शहर को अपना परिवार माना।ये सिर्फ़ खाकी नहीं हमारा यक़ीन और सम्मान है।जिसे हमारे पुलिस के जवानों ने इस वर्ष भी बाख़ूबी निभा कर बताया है,सभी आयोजनों का सफल सम्पन्न होना इसकी दलील है।


