ताज ख़ान
नर्मदापुरम//
इस्लाम एक ऐसा व्यापक और पूर्ण जीवन-दर्शन है, जो मानव कल्याण,शांति, न्याय और आपसी सम्मान को अपनी मूल भावना के रूप में प्रस्तुत करता है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ का पवित्र जीवन इन सिद्धांतों की व्यावहारिक व्याख्या है कि विभिन्न धर्मों,समुदायों और संस्कृतियों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कैसे संभव है।आपकी सीरत केवल एक धार्मिक नेता के जीवन का वर्णन नहीं,बल्कि एक ऐसी महान हस्ती का जीवन है, जिसने धार्मिक मतभेदों के बावजूद मानवता को जोड़ने,सामाजिक न्याय स्थापित करने और आपसी सम्मान को बढ़ावा देने की उज्ज्वल मिसाल कायम की।
अलग अलग कबीलों में थी मानवजाति।
जब पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ लाए तो वहाँ एक बहुधार्मिक और बहु-जनजातीय समाज मौजूद था।मुसलमान, यहूदी क़बीले और अन्य अरब समुदाय अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पहचान के साथ रहते थे। ऐसे वातावरण में आपने जो महत्वपूर्ण कदम उठाया,वह एक लिखित संविधान यानी मीसाक़-ए-मदीना की स्थापना थी।यह समझौता मानव इतिहास की एक महत्वपूर्ण मिसाल है, जिसमें विभिन्न समुदायों के अधिकारों, जिम्मेदारियों और आपसी संबंधों को स्पष्ट किया गया।इस समझौते में यहूदियों और अन्य गैर-मुस्लिम समूहों को धार्मिक स्वतंत्रता, जान-माल की सुरक्षा और न्याय की गारंटी दी गई। यह इस बात को स्पष्ट करता है कि इस्लामी सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद समावेशिता और न्याय पर आधारित है,न कि ज़बरदस्ती और भेदभाव पर।
क्या कहती है मुकद्दस किताब क़ुरआन-ए-करीम।
क़ुरआन-ए-करीम ने मानव स्वतंत्रता और आस्था के सम्मान को एक मूल सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया है:
“لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ” (अल-बक़रह: 256)
अर्थात धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। यह आयत स्पष्ट करती है कि ईमान एक आंतरिक और सचेत निर्णय है,जिसे शक्ति या दबाव के माध्यम से थोपा नहीं जा सकता। इसी सिद्धांत का व्यावहारिक रूप हमें पैग़म्बर ﷺ के पूरे जीवन में दिखाई देता है।
पैग़म्बर मुहम्मद का गैर-मुस्लिमों के साथ व्यवहार हमेशा न्याय,दया और अच्छे आचरण पर आधारित रहा।आपने केवल मुसलमानों के अधिकारों की ही रक्षा नहीं की,बल्कि गैर-मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा को भी अपनी जिम्मेदारी माना। इतिहास में यह घटना प्रसिद्ध है कि जब एक यहूदी का जनाज़ा गुज़रा तो आप सम्मानपूर्वक खड़े हो गए।साथियों ने कहा कि यह तो एक गैर-मुस्लिम का जनाज़ा है,तो आपने फरमाया,“क्या वह इंसान नहीं है?”यह वाक्य मानव गरिमा की ऐसी महान अभिव्यक्ति है,जो धर्म, नस्ल और समुदाय से ऊपर उठकर इंसान को सम्मान प्रदान करता है।इसी प्रकार नज्रान के ईसाई प्रतिनिधिमंडल का प्रसंग भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।वे मदीना आए और उन्हें मस्जिद-ए-नबवी में अपने धार्मिक तरीके के अनुसार इबादत करने की अनुमति दी गई।यह घटना इस बात की स्पष्ट मिसाल है कि इस्लाम केवल धार्मिक सहिष्णुता की बात नहीं करता,बल्कि उसे व्यवहार में भी स्थान देता है।
पैग़म्बर और दीन।
पैग़म्बर ने धार्मिक मतभेदों को कभी भी दुश्मनी या नफरत का आधार नहीं बनाया,बल्कि संवाद,तर्क और अच्छे आचरण के माध्यम से संबंधों को बेहतर बनाने का रास्ता अपनाया।इसके अलावा, आपने हमेशा पड़ोसियों, संधि करने वाले समुदायों और गैर-मुस्लिम नागरिकों के अधिकारों की कड़ी सुरक्षा की।हदीस में चेतावनी दी गई है कि जिसने किसी गैर-मुस्लिम मुआहिद पर अत्याचार किया या उसका अधिकार छीना,तो क़यामत के दिन पैग़म्बर स्वयं उसके विरुद्ध दावा करेंगे।यह शिक्षा स्पष्ट करती है कि इस्लामी नैतिकता में न्याय का दायरा सार्वभौमिक है और किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है।यदि हम आज के भारतीय संदर्भ में इन शिक्षाओं को देखें तो उनकी प्रासंगिकता और भी स्पष्ट हो जाती है। भारत एक विशाल लोकतांत्रिक देश है,जहाँ विभिन्न धर्मों,भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं।इस विविधता की वास्तविक शक्ति तभी कायम रह सकती है जब आपसी सम्मान,कानून का पालन और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा दिया जाए।
तालीमत।
इस बारे में लेखक शहाबुद्दीन, जो दिल्ली के एक स्वतंत्र इस्लामिक विचारक और चिंतक हैं,लिखते हैं कि आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि मतभेद और धार्मिक विविधता को दुश्मनी में बदलने से रोका जाए।पैग़म्बर की सीरत हमें यह शिक्षा देती है कि मतभेदों को सहन करना, दूसरे के विश्वास का सम्मान करना और साझा मानवीय मूल्यों पर एकता स्थापित करना ही स्वस्थ समाज की बुनियाद है। यदि समाज से न्याय समाप्त हो जाए तो शांति भी कमजोर पड़ जाती है, और यदि न्याय कायम रहे तो मतभेदों के बावजूद समाज प्रगति कर सकता है।भारत जैसे देश में,जहाँ विभिन्न धर्मों के मानने वाले एक साथ रहते हैं, पैग़म्बर की शिक्षाएँ एक महत्वपूर्ण नैतिक मार्गदर्शन प्रस्तुत करती हैं।यदि प्रत्येक वर्ग यह समझे कि मानवता एक महत्वपूर्ण मूल्य है और न्याय एक मूल सिद्धांत है,तो नफरत, पूर्वाग्रह और हिंसा की संभावनाओं को कम किया जा सकता है।पैग़म्बर मुहम्मद ने मानवता को केंद्र में रखा और लोगों की धार्मिक एवं सामाजिक पहचान के बावजूद उनके मानवीय सम्मान को महत्व दिया।आपकी शिक्षाओं का मूल संदेश यह है कि इंसान के साथ सम्मान, न्याय और अच्छे व्यवहार से पेश आया जाए।इसी सिद्धांत को यदि आज के समाजों में अपनाया जाए तो एक शांतिपूर्ण, विकसित और सौहार्दपूर्ण समाज का निर्माण किया जा सकता है।
अंत में यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद की सीरत-ए-तैयबा हमें केवल इबादत और धार्मिक जीवन के बारे में ही मार्गदर्शन नहीं देती,बल्कि सामाजिक संबंधों, अंतरधार्मिक सद्भाव और मानव अधिकारों के संबंध में भी महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान करती है।यदि हम इन सिद्धांतों को ईमानदारी से अपने जीवन का हिस्सा बनाएं तो न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में शांति, प्रेम,सहिष्णुता और भाईचारे को बढ़ावा दिया जा सकता है,जो प्रत्येक इंसान की साझा आवश्यकता और आकांक्षा है।

